आरे बचाओ के नाम पर असामाजिक तत्वों द्वारा मुंबई का विकास रोकने की साज़िश

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आप में से कई लोगों ने पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया तथा समाचारपत्रों द्वारा आरे बचाओ मुहिम के बारे में सुना होगा | जंगल को बचाने के नाम पर खूब बयानबाज़ी और प्रदर्शन हो रहा है | ऊपरी तौर पर देखने पर यह लगता है कि यह लोग मुंबई के शुभचिंतक है | शहर का जंगल बचाने के लिए मेहनत कर रहे हैं | लेकिन यदि मामले का गहराई से अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि पूरा आंदोलन एक छलावा मात्र है | इसमें शामिल तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता मुंबई का भला करने के बजाय उसका नुकसान ज्यादा कर रहे हैं | 

हम सब जानते हैं कि मुंबई की इस विशाल आबादी की वजह से हमारे यातायात के साधनों पर प्रचंड दबाव है | हर वर्ष औसतन दो हजार लोग सिर्फ और सिर्फ लोकल ट्रेन की दुर्घटनाओं में मर रहे हैं | इसके अलावा तीन हजार से चार हजार लोगों की मृत्यु सड़क दुर्घटनाओं में हो रही है | इन आंकड़ों से आप लोग साफ़ समझ सकते हैं कि हम लोगों को यातायात के नए साधनों की कितनी ज्यादा जरुरत है | हमकों जल्दी से जल्दी शहर में यातायात के नए साधनों का निर्माण करना ही करना है | 

ऐसे में मेट्रो रेल का प्लान बना | बाकी सरकारी कामों की तरह इसकी रफ़्तार भी काफी धीमी रही | जैसे-तैसे अँधेरी से घाटकोपर के बीच एक लाइन का काम पूरा हुआ | अभी चार और लाइन का काम चल रहा है | लेकिन जबसे यह मेट्रो का काम शुरू हुआ है, तब से इसपर कुछ तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ग्रहण लगाना शुरू कर दिया | कुछ कार्यकर्ताओं ने कोर्ट में केस कर दिया कि मेट्रो को काम दिन में नहीं होना चाहिए, इससे यातायात बाधित होता है | कुछ ने केस कर दिया कि मेट्रो का काम रात में नहीं होना चाहिए क्योंकि शांति भंग होती है | सोचिये इन कार्यकर्ताओं के मूर्खता की हद कितनी है ! मेट्रो का काम दिन में नहीं, रात में नहीं, तो होगा कब ? इस चक्कर में एक वर्ष काम अटका रहा | 

वहाँ से मामला निकला तो इन तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक और शिगूफा छेड़ दिया कि आरे में मेट्रो कारशेड न बनाया जाए | मेट्रो कारशेड तथा अन्य कारणों से वहाँ २७०० पेड़ काटने पड़ रहे हैं | उसी मुद्दे को भावनात्मक तूल देकर वो मेट्रो कारशेड का काम रुकवाने पर तुले हुए हैं | कारशेड आरे में नहीं तो कहाँ बनाया जाए, इसका उन मूर्खों के पास कोई जवाब नहीं है | वो सिर्फ और सिर्फ आरे में हो रहे मेट्रो कारशेड को रुकवाना चाहते हैं | उनसे ज्यादा जोर देकर पूछो कि आरे में नहीं तो कहाँ कारशेड बनाया जाए ? तो उनमें से कुछ दबी जबान में कहते हैं कि कांजुर मार्ग खाली जमीन पर कारशेड बनना चाहिए | पाठकों की जानकारी के लिए बता दूँ कि यह तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता कांजुर मार्ग की जिस जमीन पर कारशेड बनाने के लिए कह रहे हैं वो व्यक्तिगत संपत्ति है | उसपर कोर्ट में केस चल रहा है | कोर्ट ने उसपर किसी भी तरह के निर्माण कार्य पर रोक लगाया हुआ है | यदि सरकार कारशेड के लिए वो जमीन लेने भी जाए तो भी दो से तीन साल लग जाएँगे | ऊपर से पांच हजार करोड़ से ज्यादा का मुआवजा देना पद जाएगा | इसके अलावा आरे में कारशेड बनाने के लिए जो ग्यारह हजार करोड़ खर्च हुआ है, वो भी बर्बाद समझिये | 

आरे बचाओ के नाम पर यह मुर्ख कार्यकर्ता चाहते हैं कि सोलह हजार करोड़ फूँक दिए जाएँ | २७०० पेड़ की बजाय दूसरी जगह पाँच हजार पेड़ लगाकर दस वर्ष उसकी देखभाल करने पर भी सौ करोड़ खर्च नहीं होगा | लेकिन ऐसा करने से इन नकली कार्यकर्ताओं को नाम और शोहरत कहाँ से मिलेगी ? इनके अहंकार की संतुष्टि कैसे होगी ? इसलिए यह लोग अड़े हैं कि किसी भी तरह कारशेड का काम रुकवाया जाए | मेरी सरकार से प्रार्थना है कि ऐसे नकली समाजिक कार्यकर्ताओं के फेर में न पढ़कर जल्दी से जल्दी मेट्रो का काम शुरू करे ताकि हमारे यातायात के साधनों पर बोझ कम हो | आज के लिए इतना ही | फिलहाल इतना ही, लेख बड़ा हो रहा है | अगले लेख में इन नकली समाजिक कार्यकर्ताओं की मूर्खता का और विस्तार से पर्दाफ़ाश करूँगा | 

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