भारतीय रक्षा सेनाएँ तथा वन रैंक वन पेंशन की भीख

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आज का मुद्दा किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध न होकर पूरी सरकारी व्यवस्था के खिलाफ है | आप लोगों को वन रैंक वन पेंशन के बारे में तो पता ही होगा | न पता हो तो मैं बता देता हूँ : वन रैंक, वन पेंशन का मतलब है कि सशस्‍त्र बलों से रिटायर होने वाले समान रैंक वाले अफसरों को समान पेंशन, भले वो कभी भी रिटायर हुए हों | यानि 1980 में रिटायर हुए कर्नल और आज रिटायर होने वाले कर्नल को एक जैसी पेंशन |

रक्षा सेनाओं की लंबे समय से यह माँग रही है कि उन्हें वन रैंक वन पेंशन योजना के तहत पेंशन मिले | इसके पीछे उनका तर्क था कि रक्षा सेवा में काम करनेवाले जल्दी रिटायर होते हैं ताकि हमारी सेना जवान रहे | चालीस-पैतालीस वर्ष होते-होते कुछ एक उच्च अधिकारियों को छोड़कर लगभग सबको रिटायर हो जाना पड़ता है | ऐसे में देश को दी गई उनकी सेवाओं को ध्यान में रखते हुए उनकों आर्थिक सुरक्षा दी जाए, ऐसा उनका कहना था |

कांग्रेस की सरकार लंबे समय तक इस माँग को टालती रही किंतु भाजपा सरकार ने उनकी यह माँग कुछ वर्ष पहले स्वीकार कर ली थी | तब से भारतीय रक्षा सेना के अधिकारियों को वन रैंक वन पेंशन के हिसाब से पेंशन मिलनी शुरू हो गयी है |

ज्यादातर लोग भावुक होकर इसे सही कदम बता रहे हैं किंतु मैं इस निर्णय के बिलकुल खिलाफ हूँ | हमारी रक्षा सेनाओं ने तो देश को भावुक कर पैसा वसूल लिया लेकिन क्या उनके मन में अपने गरीब देशवासियों के लिए ज़रा भी हमदर्दी या प्रेम हैं ? मैं कहूंगा बिलकुल नहीं | सरकार ने गरीबों का शोषण न हो इसके लिए न्यनतम वेतन का नियम बनाया है | इनसुअरन्स तथा प्रोविडेंट फंड का नियम बनाया है | क्या हमारी रक्षा सेनाएँ अपने पास कॉन्ट्रैक्ट पर काम करनेवाले मजदूरों – चौकीदारों तथा अन्य को न्यूनतम वेतन देती है ? उन्हें इनसुअरन्स तथा प्रोविडेंट फंड का लाभ देती है ? उन्हें नियत साप्ताहिक छुट्टी देती है ? बिलकुल-बिलकुल-बिलकुल भी नहीं |

सोचिये, सरकार ने न्यनतम वेतन तय किया है | सेना के अधिकारियों को सिर्फ उस वेतन के हिसाब से बिल बनाकर सीडीए को भेजना होता है | वहाँ से बिल पास होकर पैसा कांट्रेक्टर से होते हुए मजदूरों को मिल जाएगा | लेकिन आलसी, कामचोर,  शराब और शबाब के नशे में डूबे हुए चरित्रहीन और भ्रष्ट सेना के अधिकारी सरकार द्वारा तय न्यूनतम वेतन का आधा वेतन ही कांट्रेक्टर को देते हैं | कांट्रेक्टर उसमें से भी पैसा काटकर मजदूरों को देते हैं | उदाहरण के तौर पर सरकार ने मुंबई में एक चौकीदार के लिए १८५०० रुपये मासिक तय किया है किंतु नौसेना की कृपा से मिलता ८५०० रुपये है | इसके अलावा कोई प्रोविडेंट फंड नहीं, कोई इन्शुअरन्स नहीं | कोई साप्ताहिक छुट्टी नहीं | महीने में तीसों दिन काम कराया जाता है | गरीबों के खून के हर कतरे को चूसकर पैसा कमाना इन कायर अधिकारियों ने अपना हक़ मान रखा है |

अब आपको बताता हूँ कि सेना के अधिकारी ऐसा करते क्यों हैं ! भारतीय सेना अपने ज्यादातर काम ठेके (कॉन्ट्रैक्ट) पर दे रही है | जो-जो सरकारी नौकरियाँ खाली हो रही हैं उन्हें भरा नहीं जा रहा है | उसके बदले कॉन्ट्रैक्ट देकर काम कराया जा रहा है | कॉन्ट्रैक्ट पर काम दिया जाएगा तभी तो कांट्रेक्टर से कमीशन मिलेगा | कई बार तो सेना के अधिकारी ही अपनी पत्नी या रिश्तेदार के नाम पर कंपनी खोल कर उस कंपनी को कॉन्ट्रैक्ट दिलाने लगते हैं | कई बार रिटायर होने के बाद सेना के अधिकारी प्राइवेट कंपनियों के दलाल बनकर उन्हें सेना का ठेका दिलाना, उनका बिल पास कराना इत्यादि काम करने लगते हैं | कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम सेना अधिकारियों की कमाई का बहुत बड़ा जरिया है |

लेकिन कॉन्ट्रैक्ट में काम देनेपर एक डर बना रहता है | कम होती हुई सरकारी नौकरियों को कैसे न्यायोचित ठहराया जाए ! यह दिखाने के लिए कि कॉन्ट्रैक्ट से कराये गए काम काफी सस्ते में हो जाते हैं, सेना के अधिकारी मजदूरों तथा चैकीदारों को आधा वेतन देते हैं | सरकार भी इस बात से खुश है कि सस्ते में काम हो रहा है | मरता तो देश का गरीब आदमी है | कॉन्ट्रैक्ट लेने देने की इस प्रक्रिया में कई सिविलियन भी शामिल होते हैं | जिससे कभी-कभी सेना के अधिकारियों को परेशानी होती | इसलिए अब उन्होंने रिटायर्ड सेना के कर्मचारियों और अधिकारियों को सिविल पदों पर कॉन्ट्रैक्ट द्वारा भरना शुरू कर दिया है | इससे अब उनके लिए भ्रष्टाचार करना आसान हो गया है |

तो अब आप लोग ही बताइये, नौकरी के दरम्यान गरीबों का शोषण करनेवाले, कॉन्ट्रैक्टरों से रिश्वत लेनेवाले, अपनी पत्नी तथा रिश्तेदारों के नाम कंपनी खोलकर कॉन्ट्रैक्ट लेनेवाले, नौकरी से रिटायर होने के बाद प्राइवेट कंपनियों के लिए दलाली करनेवाले, या सिविलियन के पदों पर काम कर भ्र्ष्टाचार के काम को आसान बनानेवाले सेना के अधिकारियों को वन रैंक वन पेंशन देना कहाँ तक सही है ! देश के खजाने को गरीबों के लिए प्रयोग न कर देश को जोंक की तरह चूस रहे इन रिश्वतखोर सेनाधिकारियों पर खर्च करना कितनी बड़ी मूर्खता है | गरीबों को पैरों के नीचे कुचल कर, उन्हें दोयम दर्जे का इंसान मानकर, उन्हें गुलामों की तरह काम करवाकर पैसा नोचनेवाले सेना के अधिकारियों का सही इनाम जेल है, पेंशन नहीं |

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