नेवल डाकयार्ड वर्क्स कमिटी के सदस्य एडमिरल सुपरिन्टेन्डेन्ट के चापलूस बने

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वर्क्स कमिटी के सदस्यों को बेचारे कामगार बड़ी उम्मीदों से चुन के भेजते हैं | उन्हें लगता है कि चुनाव के समय हाथ जोड़-जोड़कर वोट माँगने वाले उनके साथी चुन के जाने के बाद डाकयार्ड प्रशासन से उनके लिए लड़ेंगे, उनके हितों की रक्षा करेंगे | पर हर बार की तरह इस बार भी उल्टा ही हुआ है | वर्क्स कमिटी के सदस्य जाकर प्रशासन की गोद में बैठ गए हैं | रोज घंटों-घंटों की मीटिंग हो रही है | अब पता नहीं एडमिरल सुपरिन्टेन्डेन्ट और और वर्क्स कमिटी के सदस्य कौनसे युद्ध की तैयारी कर रहे हैं | इतनी देर रोज तो प्रेमी युगल भी बात नहीं करते जितनी देर यह लोग गप्पे लड़ाते हैं |

हमारी वर्क्स कमिटी के मेम्बेर्स जाकर वहाँ जाकर एडमिरल सुपरिन्टेन्डेन्ट की बस हाँ में हाँ मिलाते रहते हैं | उनके चमत्कारी व्यक्तित्व से वो पूरी तरह प्रभावित हो चुके हैं | एडमिरल सुपरिन्टेन्डेन्ट संजीव काले जी ( Rear Admiral Sanjeev Kale / Admiral Superintendent Sanjeev Kale ) ने उन्हें साफ़-साफ़ बोल दिया है कि कॉलोनी में चल रह उनके किसी भी प्रोजेक्ट पर कोई आपत्ति नहीं उठाएगा | वर्क्स कमिटी के सारे सदस्य जिनका दिल चूहों जितना ही बड़ा है, बस हाँ साब-हाँ साब ही करते रह गए | विरोध करना तो छोड़िये, ये सारे सदस्य तो अपने एडमिरल साब को प्रशंसापत्र देने के लिए भी राजी हो रहे हैं |

मैं तो सारे डाकयार्ड के कर्मचारियों से कहूँगा कि वर्क्स कमिटी के सदस्यों को पकड़-पकड़ के पूछे कि किस ख़ुशी में प्रशंसापत्र देने जा रहे हो ? और यह जो फॅमिली एकोमोड़ेशन के सामने बैचलर एकोमोड़ेशन बन रहा है, उसका वो विरोध क्यों नहीं कर रहे हैं ? उनके स्वयं के घर के आगे बैचलर एकोमोड़ेशन बने तो उन्हें स्वीकार होगा क्या ? एडमिरल सुपरिन्टेन्डेन्ट संजीव काले जी अपने घर के आगे क्यों नहीं बनवा लेते | जब जवान लडके नंग-धडंग, अपने अंतर्वस्त्रों में उनके घर के सामने घूमेंगे तब उन्हें समझ आएगा | या हो सकता ऐसा दृश्य देखने में उन्हें आनंद आए |

वर्क्स कमिटी के सदस्यों को मैं कहूँगा कि आप लोग किससे डर के चुप बैठे हो ? बाहर आकर जो डाकयार्ड प्रशासन को गालियाँ देते हो उसके बजाय काले जी के मुँह पर क्यों नहीं बोलते जो बोलना है ? किससे डर रहे हो ? संजीव काले जी ( Rear Admiral Sanjeev Kale / Admiral Superintendent Sanjeev Kale ) के पद से या उनके तथाकथित राजनैतिक संबंधों से ? आप लोग बिना डरे लड़ोगे तो कर्मचारी आपका साथ देंगे | आप लोग ही बिल में घुस जाओगे, बाहर बडबड करोगे और मीटिंग में दंडवत हो जाओगे तो अगले चुनाव में मुँह दिखाने लायक नहीं बचोगे | आपको लगता है कि साधारण डाकयार्ड के कर्मचारियों को कुछ पता नहीं लगता तो इस गलतफहमी में न रहे | अब से सब पता चलेगा | डाकयार्ड प्रशासन के साथ मीटिंग में बैठकर मेरे ब्लॉग पर SHAME-SHAME न करें | आपके निकम्मेपन के कारण मुझे यह ब्लॉग चलाना पड़ रहा है |

मेरी डाकयार्ड प्रशासन से भी प्रार्थना है कि कॉलोनी के बारे में निर्णय लेने से पहले वर्क्स कमिटी के सदस्यों से और कॉलोनी के लोगों से राय ली जाए | निर्णय लेने के बाद जानकारी देने का कोई मतलब नहीं है | आप गोरे अंग्रेज और हम काले भारतीय नहीं है कि आपने निर्णय थोप दिया और हम मान लेंगे | आपकी मुर्खता की सजा भोगने यहाँ नहीं बैठे हैं | यदि हमें भुगतना पड़ा तो आप भी भुगतोगे |

(जो लोग मुझे मेल के द्वारा ढेर सारी जानकारी और कागजात दे रहे हैं, मैं उनका शुक्रगुजार हूँ | मुझ पर भरोसा बनाए रखे, उसमें की एक-एक चीज प्रकाशित करूँगा | आप जितना ज्यादा सबूत नेवल डाकयार्ड प्रशासन के विरुद्ध भेज सके उतना ज्यादा अच्छा रहेगा | मुझसे संपर्क करने के लिए मेल करें : [email protected] )

नेवल डाकयार्ड, कांजुर मार्ग, मुंबई प्रशासन ने सिक्यूरिटी गार्ड की पगार पर डाला डाका

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नेवी के एडमिरल सुपरिन्टेन्डेन्ट संजीव काले जी ( Rear Admiral Sanjeev Kale / Admiral Superintendent Sanjeev Kale ) मेरे ब्लॉग से बहुत नाराज हैं | उन्हें लगता है कि यह ब्लॉग उन्हें बदनाम करने की साजिश है | अब खुद ही पढ़ ले उनके जूनियर अधिकारी क्या-क्या पाप कर रहे हैं | और उनमें हिम्मत है तो उनपर कार्रवाई करके बताएँ | इससे शायद उन पर कलंक न लगे | अन्यथा यदि आप आँख होते हुए भी अँधे बनोगे तो आप की भी उस पाप में शामिल ही माना जाएगा |

डाकयार्ड कॉलोनी, कांजुर मार्ग, मुंबई में ठेकेदार के द्वारा ४८ सिक्यूरिटी गार्ड सुरक्षा के लिए नियुक्त किए गए हैं | नेवल डाकयार्ड प्रशासन के अनुसार उनकी पगार है दस हजार पाँच सौ रूपए (Rs. 10500/-) | वैसे तो जो न्यूनतम वेतन का नियम है उस हिसाब से उन्हें ज्यादा पगार मिलना चाहिए था, पर वो विषय फिलहाल जाने दीजिए, यहाँ मैं दूसरे मुद्दे पर लिख रहा हूँ |

बेचारे सिक्यूरिटी गार्ड से  दस हजार पाँच सौ रूपए (Rs. 10500/-) पर साइन कराया जाता है लेकिन उन्हें दिया जाता है आठ हजार रुपये | किसी भी सिक्यूरिटी गार्ड से पूछ लीजिये कि उनकी तनख्वाह कितनी है | वो तुरंत बोलेंगे कि आठ हजार रूपए (Rs. 8000/-) | बाकि दो हजार पाँच सौ रुपये कहाँ जाते हैं ? इसका जवाब कॉलोनी के प्रशासनिक अधिकारी कमांडर मुजावर, कप्तान संधू और कमोडोर विवेक अग्रवाल को ही मालूम है | एक सिक्यूरिटी गार्ड के पगार में से २५००रुपये, तो ४८ सिक्यूरिटी गार्ड के पगार से कुल एक लाख बीस हजार रुपये ( २५०० * ४८ = १,२०,०००) हर महीने गायब हो रहे हैं ? किसकी जेब में यह पैसा जा रहा है काले जी ? ज़रा तीनों से पूछिए तो सही | या आपको पहले से पता है और आपने आँखों पर पट्टी बाँध रखी है ?

पगार के अलावा सिक्यूरिटी गार्ड को प्रोविडेंट फण्ड आदि अन्य सुविधाएँ भी मिलनी चाहिए | मिलती कुछ भी नहीं | कोई डाकयार्ड का बहादुर कामगार बस एक RTI लिख कर यह कागजात माँगे – सारे सिक्यूरिटी गार्ड का नाम, उनका प्रोविडेंट फण्ड नंबर, उनके अकाउंट में जो पैसा जमा कराया जाता है- उस बैंक का पासबुक, ठेकेदार को दिया जानेवाला लाभ | फिर देखिये मजा | इन सफ़ेद वर्दीधारियों का असली रंग दिख जाएगा |

काले जी, यह तो हाल है आपके डाकयार्ड का | गरीब सिक्यूरिटी गार्ड को भी लूट लिया जाता है | यदि आपको यह सब पता नहीं तो आप डाकयार्ड के चेयरमैन बनने के लायक हो नहीं | यदि पता होते हुए भी आप चुप हो तो उनके पापों के भागी हो | ऐसे में आपकी बदनामी नहीं होगी तो क्या तारीफ़ होगी ???

( पाठकों के लिए : इस बार हिंदी आसान लिखी है ताकि सबको आसानी से समझ आ जाए | बाकि आप सब मुझसे संपर्क बनाए रखें | आप लोगों की प्रतिक्रिया से मैं अतिउत्साहित हूँ | आपको पता है मुझसे संपर्क करने के लिए [email protected] पर मेल करना है |)

नेवल डाकयार्ड कॉलोनी, कांजुर मार्ग के सुपरमैन – सहायक सुरक्षा अधिकारी चीमन लांबा

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पहले तो मैं आप सब से क्षमा चाहूँगा क्योंकि कल के दिन मैंने कोई लेख नहीं लिखा | एक बेशकीमती दिन चला गया और हंस के वेश में छुपे हुए इन बगुलों की मैंने कोई पोल नहीं खोली | उम्मीद करता हूँ कि मेरा पिछला लेख डाकयार्ड कॉलोनी कांजुरमार्ग, मुंबई में पूर्व नौसेना कर्मचारी ने मचाई लूट आप सब ने जरुर पढ़ा होगा | न पढ़ा हो तो तुरंत उपरोक्त लिंक पर क्लिक करें | आप स्वयं भी पढ़ें और दूसरों को भी पढ़ाएँ | इससे मेरा लिखने का उत्साह बना रहेगा |

चलिए अब पिछले लेख से आगे बढ़ते हैं | अहलावत पुराण से अब हम लांबा पुराण पर आते हैं | चीमन लांबा जी इस समय नेवल डाकयार्ड कॉलोनी, कांजुर मार्ग, मुंबई के सहायक सुरक्षा अधिकारी हैं | वो सबको बड़े गर्व से बताते हैं कि “I am Ex-Navy.” जिस दिन पहली बार मैनें उनके मुँह से यह शब्द सुना था, उसी दिन से मैं उनके चमत्कारी व्यक्तित्व से प्रभावित हो गया | मैनें लोगों से उनके बारे में काफी पूछताछ की | इससे मुझे उनके व्यक्तित्व के ऐसे अनछुए पहलुओं का पता कि मैं उनका भक्त बना गया | वही सब मैं अब आपको बताने जा रहा हूँ और मुझे पूरा यकीन है कि यह लेख पूरा पढ़ते-पढ़ते आप भी चीमन लांबा जी के भक्त बन जाएँगे |

सबसे पहले तो लांबा जी की चाल देखिये | सुबह-सुबह जब वो सुरक्षा कार्यालय से प्रशासनिक कार्यालय की तरफ निकलते हैं तो उनकी गति देखकर चींटी का भी घमंड टूट जाता है | लांबा जी सुबह सुरक्षा कार्यालय से निकलते हैं और दोपहर तक प्रशासनिक कार्यालय पहुँच जाते हैं | वहाँ से कुछ मिनटों में काम पूरा करके वो दोपहर को ही प्राशानिक कार्यालय से निकल जाते हैं और शाम तक दोबारा सुरक्षा कार्यालय पहुँच जाते हैं | इस तरह उनका पूरा दिन कॉलोनी वासियों की सेवा में निकल जाता है | उनकी चुस्ती-फुर्ती के क्या कहने ! देखकर ऐसा लगता है हमारे नौसेना के अधिकारियों को इनको लायन गेट की सुरक्षा में रख लेना चाहिए | पर हमारे अधिकारियों की दरियादिली है कि उन्होंने ऐसे योग्य व्यक्ति को नेवल डाकयार्ड कॉलोनी का सुरक्षा अधिकारी बनाया है | लांबाजी से बेहतर सुरक्षा अधिकारी शायद ही किसी को मिले | उनकी छत्रछाया में पूरी डाकयार्ड कॉलोनी स्वयं को सुरक्षित महसूस करती है | ६५-७० वर्ष का सुरक्षा अधिकारी सबके भाग्य में थोड़ी होता है |

चीमन लांबा जी की एक और खासियत है | वो हरफनमौला है | वो एक साथ कई जिम्मेदारियाँ निभाने में सक्षम  हैं | जब वो कॉलोनी के मुख्य सुरक्षा अधिकारी थे, उसी समय वो कॉलोनी के महाठग गोपाल कुमार (इस महान व्यक्ति की गाथा कभी और बताऊँगा) के चपरासी का काम भी करते थे और बड़ी तत्परता से अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करते थे | गोपाल कुमार की आज्ञा और मार्गदर्शन से उन्होंने वर्षों तक कॉलोनी की सुरक्षा का अत्यंत कुशलता से संचालन किया | यही कारण है कि बांग्लादेश के नागरिक तक डाकयार्ड कॉलोनी में रहकर खुद को सुरक्षित महसूस करते थे | (बांग्लादेशी वाली कहानी कभी और सुनाऊँगा |)

चीमन लांबा जी की इन योग्यताओं के बावजूद उनपर बहुत अन्याय हुआ है | एक समय वो डाकयार्ड कॉलोनी के मुख्य सुरक्षा अधिकारी हुआ करते थे | उतने में यह खबर फ़ैल गई कि वे सुरक्षा कार्यालय में एक महिला सुरक्षा कर्मचारी के साथ रंगरेलियाँ मनाते हैं | लोगों को यह भी पता चल गया कि कॉलोनी में बाहर की गाड़ियों को गैरकानूनी रूप से पार्किंग करने देकर वो मोटा माल कमा रहे हैं | फिर क्या था, बेचारे की पदावनति (Demotion) कर उन्हें सहायक सुरक्षा अधिकारी बना दिया गया | इतना बड़ा अत्याचार हुआ उनके साथ | नौसेना प्रशासन को सोचना चाहिए था कि लांबा जी नौसेना के निवृत्त कर्मचारी हैं | कोई आम इंसान थोड़े ही हैं | 

सुरक्षा कार्यालय में कई आए और कई गए पर लांबा जी आज भी वहीं हिमालय की तरह अडिग हैं | हमारी तनख्वाह से कॉलोनी की सुरक्षा के लिए जो पैसा कटता है उसका इससे बेहतर उपयोग क्या हो सकता है ! मैं तो नेवल डाकयार्ड प्रशासन को सुझाव दूँगा कि तुरंत चीमन लांबा जी कीतनख्वाह दुगुनी कर दी जाए | हमारी मेहनत का पैसा जब हमारी जेब से लांबा जी की जेब में पहुँचता है तो हमें हमारा जीवन धन्य प्रतीत होता है |

चलिए चीमन लांबा पुराण भी यहीं समाप्त करता हूँ | एक ही विषय में दो लेख लिखकर मैं भी ऊब गया हूँ | अगली बार कुछ नया लिखूँगा | पाठक गण अपना आशीर्वाद मुझ पर बनाए रखें | मेरे लेख को खुद भी पढ़ें और दूसरों को भी पढ़ाएँ | फेसबुक और ट्वीटर पर लोगों के साथ शेयर करें और अपने विचारों से मुझे जरूर-जरूर अवगत कराएँ | मेरा मेल है : [email protected]

(मुझे पता चला है कि एडमिरल सुपरिन्टेन्डेन्ट संजीव काले जी ( Rear Admiral Sanjeev Kale / Admiral Superintendent Sanjeev Kale ) इस ब्लॉग में लिखी बातों से बहुत नाराज हैं | तिलमिलाए और बौखलाएँ हुए हैं | मेरी उनसे प्रार्थना है कि इतना नाराज होने की जरूरत नहीं है | इतने दिनों से हम लोग आप सफ़ेद वर्दीवालों को झेल रहे हैं | आज जब आपको आइना दिखाया जा रहा है तो बड़ी मिर्ची लग रही है | यह ब्लॉग चलता रहेगा और मैं लिखता रहूँगा, बाकि जो आपकी इच्छा हो करें |)

 

डाकयार्ड कॉलोनी कांजुरमार्ग, मुंबई में पूर्व नौसेना कर्मचारी ने मचाई लूट

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आज का लेख भ्रष्टाचार के नाम | नौसेना के अधिकारी यह कोशिश करते रहते हैं कि नौसेना से निवृत्त (Retire) होनेवाले जो अधिकारी या कर्मचारी है उनके लिए कुछ ऐसे इंतजाम किये जाए जिससे निवृत्ति के बाद भी उन्हें कुछ कमाई होते रहे | इसी तर्ज पर उन्हें नौसेना के इलाकों में छोटी-मोटी दुकाने दे दी जाती है, कभी-कभी नौसेना में जिन ठेकेदारों को काम दिया जाता है उन्हें बोलकर उनके पास काम पर रखवा दिया जाता है | कुछ निवृत्त अधिकारी खुद ठेकेदार बन जाते हैं और नौसेना से ठेका लेने लगते हैं | यह सब काफी आम बात है |

अब यह सुनने में तो कुछ ख़ास गलत नहीं लगता, पर सरकारी कामों में कुछ गलत न हो यह बहुत मुश्किल है  | नौसेना के निवृत्त कर्मचारियों और अधिकारियों को एडजस्ट करने के नाम पर ऐसे-ऐसे कुकर्म हो रहे हैं कि क्या बताऊँ !!! मैं आज इस लेख में बस एक छोटा सा उदाहरण दूँगा |

एक निवृत्त नौसेना के कर्मचारी है सत्यप्रकाश अहलावत जी | उनकी पत्नी के नाम पर नेवल डाकयार्ड प्रशासन ने डाकयार्ड कॉलोनी, कांजुरमार्ग, मुंबई में  सिलाई की एक दूकान दे रखी है | अब यहाँ तक तो ठीक है | (वैसे तो ठीक यहाँ पर भी नहीं है, वो कभी और लिखूँगा |) अब अहलावत जी को लगता है कि वो भूतपूर्व नौसेना कर्मचारी है तो डाकयार्ड कॉलोनी उन्हीं की मिलकियत है | कॉलोनी में पच्चीसों दुकानें हैं, किसी दूकान वाले की हिम्मत नहीं कि अपनी दूकान को बड़ा करे | नेवल डाकयार्ड प्रशासन तुरंत कार्रवाई करेगा | पर अहलावतजी ने अपनी दूकान को गैरकानूनी तरीके से दस फूट आगे बढ़ा रखा है | किसी की मजाल कि उसे तोड़े !!! कॉलोनी के प्रशासनिक अधिकारी कमांडर मुजावर को सब पता है | कप्तान संधू तो अहलावत जी के ख़ास दोस्त है, उनकी दूकान के खुद चक्कर लगा चुके हैं | खुद देख चुके हैं गैरकानूनी है, पर वो भी सोच रहे होंगे कि “अपना नौसेना वाला भाई है | इसे तो हर हाल में बचाना है | यह भी मलाई खा रहा है, मैं भी खा रहा हूँ | आज उस पर कार्रवाई के लिए बोलूँगा तो कल मुझ पर भी कार्रवाई होगी |” वैसे भी कप्तान संधू जैसे गुणवान और चरित्रवान व्यक्ति से ज्यादा उम्मीद बेमानी है |

कमोडोर विवेक अग्रवाल और एडमिरल सुपरिन्टेन्डेन्ट संजीव काले ( Rear Admiral Sanjeev Kale / Admiral Superintendent Sanjeev Kale ) भी कॉलोनी का नियमित दौरा करते करते हैं | उनको नेवल डाकयार्ड में सुपरवाइजरों की कैंटीन तो दिखी है पर अहलावत का गैरकानूनी निर्माण आज तक नहीं दिखा | बेचारे सुपरवाइजरों की कैंटीन पर ताला लगवा दिया | लोगों की रोटी खानेवाली जगह पर ताला लगवाने की हिम्मत सब में नहीं होती | उसके लिए कमोडोर विवेक अग्रवाल और एडमिरल सुपरिन्टेन्डेन्ट संजीव काले जैसा जीगर चाहिए | दोनों का कहना था कि सुपरवाइजरों की कैंटीन और उनका कार्यालय दोनों गैरकानूनी है | तो अब नेवल डाकयार्ड प्रशासन क्यों नहीं उच्च न्यायालय जा रहा ? क्यों CAT कोर्ट के आदेश के बाद AINTSSA से समझौता कर लिया ? अब वो कार्यालय गैरकानूनी नहीं रहा क्या ?

अब बात यहीं तक रहती तो भी ठीक था | इसके आगे भी सुनिए कि अहलावतजी और नेवल डाकयार्ड प्रशासन क्या गुल खिला रहे हैं | डाकयार्ड कॉलोनी, कांजुर मार्ग, मुंबई में बच्चों के लिए शिशु विकास केंद्र है | वहाँ पढ़नेवाले बच्चों के लिए यूनिफार्म सिलाने का कॉन्ट्रैक्ट सबसे कम बोली लगानेवाले को दिया जाता था | इस बार ऐसा कुछ नहीं किया गया | जिन भी बच्चों का वहाँ प्रवेश हुआ, सबके माता-पिता को यूनिफार्म लेने अहलावतजी की दूकान पर भेज दिया गया | अहलावतजी की चाँदी ही चाँदी | सिर्फ कपडे ही नहीं, बच्चों के लिए शिशु विकास केंद्र में लगनेवाली हर चीज अहलावतजी की दूकान पर बिकने लगी | कोई भी चीज चाहिए तो अभिभावकों को बस एक ही दूकान का पता दिया जाता है | जबकि नियम के अनुसार अहलावतजी की दूकान पर वो सारी चीजें बिक ही नहीं सकती | नौसेना ने उन्हें उन चीजों को बेचने की अनुमति नहीं दी है | कॉलोनी का कोई और दुकानवाला इस तरह अपना व्यवसाय बदले तो तुरंत उस दूकान पर कार्रवाई हो जाएगी | पर अहलावतजी की दूकान को कोई छू नहीं सकता | वो नौसेना के निवृत्त कर्मचारी हैं | कोई आम इंसान थोड़े ही हैं | 

नेवल डाकयार्ड प्रशासन को शर्म से डूब मरना चाहिए | विद्यालय को भी नहीं छोड़ा |

चलिए लंबा लेख हो गया | अहलावत पुराण यहीं ख़त्म करता हूँ | पर आप लोग मेरी वेबसाइट का पता http://ebharat.net/ जरुर याद रखें और रोज पढ़ें | बहुत कुछ लिखना बाकी है | मैं इन सफ़ेद वर्दीधारियों के पापकर्म उजागर करता रहूँगा |

मुझसे संपर्क करके अपने विचार जरुर बताएँ | मेरा मेल है : [email protected]

नेवल डाकयार्ड सुपरवाइजर एसोसिएशन (AINTSSA) के पदाधिकारी दोबारा मुर्ख बने

aintssaनेवल डाकयार्ड सुपरवाइजर एसोसिएशन  (AINTSSA) के पदाधिकारी whtsapp पर एक मेसेज खूब भेज रहे हैं :

Salute to the Indian judiciary system. our Judiciary system has proved it again as to why it is the best system in the world. In a land mark decision on our ad interim protection, the Hon. CAT, in it’s 16 page order, has directed the respondents to take appropriate action to comply with the ad-interim order of status quo ante within two days from the date of receipt of the order. Accordingly, our AINTSSA office, which was sealed by the order of the Estate officer will be opened at 10.30 hrs on 28th Nov(Monday). All r requested to visit the office for redressal of grievances as was being done till 18th Nov 16. Thanks to Dockyard administration for compliance of the order of Hon. CAT, Bombay, Mumbai.

अब यह पढ़िए | डाकयार्ड प्रशासन को धन्यवाद दे रहे हैं कि न्यायालय की आज्ञा के अनुसार वो उनका कार्यालय खोलकर दे रहे हैं | कोर्ट से आर्डर आकर दो दिन बीत गए थे, यही प्रशासन घास भी नहीं डाल रहा था | वो तो Contemp of Court की नोटिस देने की नौबत आई, तब जाकर एडमिरल सुपरिन्टेन्डेन्ट ने कार्यालय खोलने की अनुमति दी | अब ऐसे प्रशासन को धन्यवाद देने का क्या मतलब ???

मेसेज तो यह फैलाना चाहिए था कि अपनी लोकतांत्रिक शक्तियों का उपयोग कर, नौसेना के अधिकारियों को उनकी जगह दिखाकर AINTSSA अपना हक़ छीन के लाइ है | आगे से कोई अधिकारी सुपरवाइजरों के अधिकारों पर डाका डालने की हिम्मत न करे |

ऐसा करने के बजाय नौसेना प्रशासन को धन्यवाद दिया जा रहा है | ऊपर से AINTSSA के पदाधिकारी एडमिरल सुपरिन्टेन्डेन्ट से समझौता कर आए | उन्होंने AINTSSA का कार्यालय खुलवाकर कोई मेहरबानी नहीं की | कार्यालय कोर्ट के आदेश से खुला है, उनकी दया से नहीं | फिर कप्तान संधू का क्या ? वो जो दारु पीकर इतनी गालियाँ दे गया, क्या एडमिरल सुपरिन्टेन्डेन्ट उसपर कोई कार्रवाई करने जा रहे हैं ? या उसके सारे पाप माफ़ हो गए ? कोई डाकयार्ड का साधरण कर्मचारी शराब पीकर किसी नौसेना वाले को गाली दे देता तो उसकी नौकरी चली जाती | यहाँ कप्तान संधू ऐश कर रहे हैं | अब AINTSSA के पदाधिकारियों में लड़ने की हिम्मत ही न हो तो कोई क्या करे |

उन्हें यह कहकर आना चाहिए था कि जब तक गालियाँ देने वाले कप्तान संधू पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक प्रशासन से कोई बात नहीं होगी | प्रशासन से कोई सहयोग नहीं किया जाएगा | न्यायालयने दो दिन में कार्यालय खोलने कहा था, यहाँ ५ दिन में खुल रहा है | Contemp of Court की नोटिस देकर जिम्मेदार अधिकारियों पर कारवाई के लिए कोर्ट जाना चाहिए | यही मौका था दिखाने का कि यह लोकतंत्र है, नौसेना का कोई अधिकारी यदि यह समझता है कि उसकी सफ़ेद वर्दी उसे हमसे बड़ा बनाती है तो वो गलत है |

एडमिरल सुपरिन्टेन्डेन्ट ने बुलाकर थोडा डाँटा, थोडा पुचकारा तो बेचारे पदाधिकारी सब भूल गए | पिछले समझौते का नतीजा भी भूल गए | उनको लगता है – “इतना बड़ा साहब हमसे बुलाकर बात कर रहा है, हमारा जीवन धन्य हो गया |” यही हाल है यूनियन का भी और AINTSSA का भी | इसीलिए नौसेना के अधिकारी कामगारों और सुपरवाइजरों से ऐसा व्यवहार करते हैं | और हमारे चूहे जैसे दिल वाले साथी उन्हीं अधिकारियों को अपना माई-बाप बना बैठे हैं | अधिकारी इन्हें अपनी गोल-मोल बातों से बेवकूफ बनाते हैं और यह बनते हैं | ऐसे संघर्ष आगे नहीं बढ़ता |

इसे पढ़नेवाले सभी नेवल डाकयार्ड के कर्मचारियों को मेरा आवाहन है, अपना आत्मसम्मान मत बेचो | इन वर्दीवालों से के विरुद्ध बोलना और लिखना सीखो | देश के रक्षक होने के नाम पर यह नौसेना वाले हमें गुलाम बना कर रखने का प्रयत्न कर रहे हैं | इनका विरोध करो, हर कदम पर विरोध करो |

(मुझसे [email protected] पर मेल कर संपर्क किया जा सकता है |)