फिल्मसिटी को हाँ पर मेट्रो कारशेड को ना, आरे बचाओ के नाम पर समाज को गुमराह करने की कोशिश

Fake Aaarey protest

आजकल मुंबई में मेट्रो कारशेड का मामला गर्म है | हर छुट्टी के दिन आंदोलन हो रहा है | रोज किसी न किसी प्रसिद्द व्यक्ति का इसपर बयान आ रहा है | पूरा दिन एयर कंडीशन में बिताने वाले, दिन भर कार में घूमने वाले कई लोग आरे बचाओ कार्यकर्ता बन गए हैं | सोशल मीडिया में नए-नए पोस्ट डालकर इस मामले में पूरी दुनिया को ज्ञान देना उनका नया शौक बन गया है | यदि कोई आरे में मेट्रो कारशेड का समर्थन कर दे तो उसे गालियाँ देना इन्होनें अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान रखा है | इन लोगों ने प्रोपेगंडा की पूरी मशीनरी तैयार कर रखी है | कान्वेंट स्कूलों से मासूम बच्चों को आंदोलन में ले जाकर लोगो को भावनात्मक ब्लैकमेलिंग करना इनका मुख्य हथियार है | उन मासूम बच्चों को इन आरे बचाओ कार्यकर्ताओं की दोग़लापंती की समझ कहाँ !

अब आइये आपको कारशेड से फिल्मसिटी पर ले चलता हूँ | फिल्मसिटी भी उसी आरे के जंगलों के बीच है | उसका आकार भी मेट्रो कारशेड से काफी बड़ा है | उसको बसाने के लिए काफी जंगल काटना पड़ा था | आप कहेंगे यह तो पुरानी बातें है, उसका वर्तमान के आरे आंदोलन से क्या लेना देना ! तो आपको बता दूँ कि आज भी फिल्मसिटी के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जा रहे हैं | फिल्मसिटी वाले इसके लिए किसी महानगरपालिका से अनुमति भी नहीं माँगते | दो स्थानीय ठेकेदार शिवा शेट्टी और सुनील देसाई को पैसा देकर हर वर्ष हजारों पेड़ गैरकानूनी रूप से कटवा दिए जाते हैं | उन जगहों पर नया निर्माण कर दिया जाता है | प्रस्तुत दो चित्रों से यह बात पूरी तरह साफ़ हो जाती है |

aarey

दोनों तस्वीरों की तुलना कीजिये | एक है वर्ष २००० की फिल्मसिटी | एक है २०१९ की | देखिये किस तरह से हरियाली गायब हुई है | आज के समय में इमारतों के अलावा कुछ दिख ही नहीं रहा है | खुलेआम हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर ड़ाका डाला जा रहा है | वो भी किसके लिए ? ५० से १०० करोड़ रुपये खर्च कर फिल्म निर्माण करेवालों के लिए | जो फिल्म निर्माता इतना पैसा खर्च करने का सामर्थ्य रखते हैं वो दूसरी जगह किराए पर लेकर भी फिल्मों की शूटिंग कर सकते हैं | लेकिन इनके पेड़ काटने से किसी को शिकायत नहीं है | किसी भी नेता, अभिनेता या तथा कथित आरे बचाओ कार्यकर्ताओं ने आज तक फिल्मसिटी के विरुद्ध बयान नहीं दिया | उनके खिलाफ कोई आंदोलन नहीं हुआ | और होगा भी नहीं | फिल्मसिटी की मीडिया में इतनी पकड़ है कि उनके खिलाफ प्रोपेगंडा फैलाना मुश्किल है | फिर वो सही जगह रिश्वत देकर मुँह बंद कराने से पीछे भी नहीं हटते |

आप लोग कभी इन आरे बचाओ कार्यकर्ताओं से इस मामले में बात कर के देखिये | इनका असली रंग तुरंत सामने आएगा | इन आंदोलन के आयोजकों से बस इतना बोले कि मेट्रो कारशेड भी आरे में, फिल्मसिटी भी आरे में | वहाँ तक जाकर आंदोलन की इतनी मेहनत कर रहे हो तो बस अपने पोस्टर में फिल्मसिटी का नाम भी जोड़ दे | फिल्मसिटी द्वारा हो रहे गैरकानूनी निर्माण को रोकने से, वहाँ चल रही फिल्मसिटी को बंद करने से आरे के जंगल का कई गुना ज्यादा भला होगा | वैसे भी फिल्मसिटी विलास की वस्तु है, मेट्रो ट्रैन की तरह लोगों की जरुरत नहीं | लेकिन जैसे ही आरे बचाओ कार्यकर्ताओं को यह सब बातें बताने लगोगे वो आपको गालियाँ देना, आपकी औकात बताना आदि-आदि शुरू कर देंगे | उन्हें फिल्मसिटी द्वारा पेड़ काटने से कोई शिकायत नहीं, लेकिन मेट्रो कारशेड से परेशानी है | अब आप ही सोचिये कि ये तथाकथित आरे बचाओ कार्यकर्ता समाज के हित में काम कर रहे हैं या अहित में |

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