पी एम सी बैंक डूबने के बाद कितना सुरक्षित है आपका पैसा नेवल डाकयार्ड को ऑपरेटिव बैंक में !

naval-dockyard-co-operative-bank

आपके और मेरे जैसे लाखों मध्यमवर्गियों के लिए अभी कुछ दिनों पहले एक बड़ी बुरी खबर आयी है | देश की सबसे सफल को ऑपरेटिव बैंकों में से एक पीएमसी बैंक लगभग डूबने के कगार पर है | लाखों लोगों की जिंदगी भर की कमाई इस बैंक में थी जो वापस मिलना लगभग नामुमकिन सा हो गया है | हर दिन पीएमसी बैंक से जुडी कोई न कोई नयी जानकारी सामने आ रही है और यह लगभग निश्चित हो गया है कि बैंक अब दिवालिया हो जायेगी | अब ऐसे में गरीबों के पैसे का क्या होगा यह भगवान को ही मालूम है | सरकार बैंक की जिम्मेदारी वापस लेते हुए लोगों को उनके पैसे की गारंटी देगी या नहीं, पता नहीं |

मुंबई में ऐसा हाल हो गया है कि लोग ऑपरेटिव बैंक में पैसा रखने से डरने लगे हैं | जिन ऑपरेटिव बैंकों के बारे में अब तक कोई गलत खबर नहीं है, लोग वहाँ से भी पैसा निकाल रहे हैं | कई ऑपरेटिव बैंकों के पास पैसे की इतनी कमी हो गई है कि वो अगले दस दिन तक पैसा नहीं दे सकते | इसका मतलब यह कि यदि कल को इन ऑपरेटिव बैंक के किसी खाताधारक को इमरजेंसी में पैसे की जरुरत पड़ गयी तो भी उसे पैसा नहीं मिलेगा | लोगों को ऑपरेटिव बैंक के नाम से डर लगने लगा है |

पीएमसी बैंक के बारे में सोचते-सोचते मेरे ध्यान में नेवल डाकयार्ड कोऑपरेटिव बैंक आया | यह भी पीएमसी की तरह कोऑपरेटिव बैंक है | आपको तो पता है कि इस बैंक के मैनेजमेंट पर लंबे समय से नेवल एम्प्लाइज यूनियन के पदाधिकारियों (NEU) का कब्जा है | पी.बी. पाणिग्राही पूरे बैंक पर कुंडली मार कर बैठे हुए हैं | समय-समय पर अपने फायदे और यूनियन के फायदे के लिए बैंक का गलत तरीके से उपयोग करने का आरोप इन पर लगता रहा है | नोटबंदी के समय जिस तरह खुलेआम नौसेना अधिकारियों के काले धन को सफ़ेद करने की कोशिश की गई थी वो सबको याद होगा | बैंक के पदाधिकारी भले कितनी भी सफाई दे, लेकिन आपको और हमको तो पता ही है कि इसी काले धन के मामले की वजह से उस समय नेवल डाकयार्ड के एडमिरल सुपरिंटेंडेंट रहे संजीव काले का करियर बरबाद हो गया |

नेवल डाकयार्ड कोऑपरेटिव बैंक के पदाधिकारी जब नौसेना को इस बात का भरोसा नहीं दिला पाए कि नोटबंदी के समय के आरोप झूठे थे, तो हम कैसे मान लें ? यदि आरोप सही नहीं थे तो संजीव काले की दुर्गति क्यों हुई ? ज़रा से कमीशन के लिए, नेवल मैनेजमेंट को खुश करने के लिए पूरे बैंक को रिस्क पर डाल दिया गया था | सोचिये उस समय यदि RBI जाँच के लिए बैंक सील कर देती तो ? या प्रवर्तन निदेशालय की रेड पड़ जाती तो ? पैसा तो आपका और हमारा अटकता | भले कुछ दिन के लिये ही सही, पर अटक तो जाता |

नेवल डाकयार्ड को ऑपरेटिव बैंक और संजीव काले का संबंध डाकयार्ड कर्मचारियों से छुपा नहीं है | कुछ वर्ष पहले यूनियन का एक पदाधिकारी अपने रिटायरमेंट के कार्यक्रम में संजीव काले के पैर छूकर धन्यवाद देता है कि आपकी मेहरबानी से मेरा बेटा नेवल डाकयार्ड को ऑपरेटिव बैंक में नौकरी पर लग गया | अब बताइये संजीव काले को धन्यवाद देने का क्या मतलब है ? नियम के हिसाब से तो बैंक में नौकरी लगवाने में काले का कोई संबंध नहीं होना चाहिए | लेकिन संजीव काले नेवल एम्प्लाइज यूनियन के पदाधिकारी पी.बी. पाणिग्राही की सहायता से वहाँ लोगों को गैरकानूनी रूप से नौकरी पर भी लगवाते और अपना काला धन सफ़ेद भी करवाते थे |

ऐसे में मुझे तो नेवल डाकयार्ड को ऑपरेटिव बैंक के मैनेजमेंट पर बिलकुल भरोसा नहीं रहा | कुछ दिनों पहले तक सबको लगता था कि पी एम सी बैंक से बढ़िया बैंक कोई नहीं | रोज बारह घंटे, साल के ३६५ दिन काम करनेवाला इकलौता बैंक | अब पता चला कि मैनेजमेंट अंदर ही अंदर सब सत्यानाश कर चुकी है | नेवल डाकयार्ड को ऑपरेटिव बैंक का मैनेजमेंट भी सज्जन लोगों के हाथ में नहीं है | पता नहीं अंदर क्या चल रहा हो ? २-३ दिन में अपने परिवार मित्रों से चर्चा कर, सारे अकाउंट बंद करके अपना-अपना पैसा हम लोग बाहर निकाल रहे हैं | आप लोग अपना-अपना सोच लें |

फिल्मसिटी को हाँ पर मेट्रो कारशेड को ना, आरे बचाओ के नाम पर समाज को गुमराह करने की कोशिश

Fake Aaarey protest

आजकल मुंबई में मेट्रो कारशेड का मामला गर्म है | हर छुट्टी के दिन आंदोलन हो रहा है | रोज किसी न किसी प्रसिद्द व्यक्ति का इसपर बयान आ रहा है | पूरा दिन एयर कंडीशन में बिताने वाले, दिन भर कार में घूमने वाले कई लोग आरे बचाओ कार्यकर्ता बन गए हैं | सोशल मीडिया में नए-नए पोस्ट डालकर इस मामले में पूरी दुनिया को ज्ञान देना उनका नया शौक बन गया है | यदि कोई आरे में मेट्रो कारशेड का समर्थन कर दे तो उसे गालियाँ देना इन्होनें अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान रखा है | इन लोगों ने प्रोपेगंडा की पूरी मशीनरी तैयार कर रखी है | कान्वेंट स्कूलों से मासूम बच्चों को आंदोलन में ले जाकर लोगो को भावनात्मक ब्लैकमेलिंग करना इनका मुख्य हथियार है | उन मासूम बच्चों को इन आरे बचाओ कार्यकर्ताओं की दोग़लापंती की समझ कहाँ !

अब आइये आपको कारशेड से फिल्मसिटी पर ले चलता हूँ | फिल्मसिटी भी उसी आरे के जंगलों के बीच है | उसका आकार भी मेट्रो कारशेड से काफी बड़ा है | उसको बसाने के लिए काफी जंगल काटना पड़ा था | आप कहेंगे यह तो पुरानी बातें है, उसका वर्तमान के आरे आंदोलन से क्या लेना देना ! तो आपको बता दूँ कि आज भी फिल्मसिटी के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जा रहे हैं | फिल्मसिटी वाले इसके लिए किसी महानगरपालिका से अनुमति भी नहीं माँगते | दो स्थानीय ठेकेदार शिवा शेट्टी और सुनील देसाई को पैसा देकर हर वर्ष हजारों पेड़ गैरकानूनी रूप से कटवा दिए जाते हैं | उन जगहों पर नया निर्माण कर दिया जाता है | प्रस्तुत दो चित्रों से यह बात पूरी तरह साफ़ हो जाती है |

aarey

दोनों तस्वीरों की तुलना कीजिये | एक है वर्ष २००० की फिल्मसिटी | एक है २०१९ की | देखिये किस तरह से हरियाली गायब हुई है | आज के समय में इमारतों के अलावा कुछ दिख ही नहीं रहा है | खुलेआम हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर ड़ाका डाला जा रहा है | वो भी किसके लिए ? ५० से १०० करोड़ रुपये खर्च कर फिल्म निर्माण करेवालों के लिए | जो फिल्म निर्माता इतना पैसा खर्च करने का सामर्थ्य रखते हैं वो दूसरी जगह किराए पर लेकर भी फिल्मों की शूटिंग कर सकते हैं | लेकिन इनके पेड़ काटने से किसी को शिकायत नहीं है | किसी भी नेता, अभिनेता या तथा कथित आरे बचाओ कार्यकर्ताओं ने आज तक फिल्मसिटी के विरुद्ध बयान नहीं दिया | उनके खिलाफ कोई आंदोलन नहीं हुआ | और होगा भी नहीं | फिल्मसिटी की मीडिया में इतनी पकड़ है कि उनके खिलाफ प्रोपेगंडा फैलाना मुश्किल है | फिर वो सही जगह रिश्वत देकर मुँह बंद कराने से पीछे भी नहीं हटते |

आप लोग कभी इन आरे बचाओ कार्यकर्ताओं से इस मामले में बात कर के देखिये | इनका असली रंग तुरंत सामने आएगा | इन आंदोलन के आयोजकों से बस इतना बोले कि मेट्रो कारशेड भी आरे में, फिल्मसिटी भी आरे में | वहाँ तक जाकर आंदोलन की इतनी मेहनत कर रहे हो तो बस अपने पोस्टर में फिल्मसिटी का नाम भी जोड़ दे | फिल्मसिटी द्वारा हो रहे गैरकानूनी निर्माण को रोकने से, वहाँ चल रही फिल्मसिटी को बंद करने से आरे के जंगल का कई गुना ज्यादा भला होगा | वैसे भी फिल्मसिटी विलास की वस्तु है, मेट्रो ट्रैन की तरह लोगों की जरुरत नहीं | लेकिन जैसे ही आरे बचाओ कार्यकर्ताओं को यह सब बातें बताने लगोगे वो आपको गालियाँ देना, आपकी औकात बताना आदि-आदि शुरू कर देंगे | उन्हें फिल्मसिटी द्वारा पेड़ काटने से कोई शिकायत नहीं, लेकिन मेट्रो कारशेड से परेशानी है | अब आप ही सोचिये कि ये तथाकथित आरे बचाओ कार्यकर्ता समाज के हित में काम कर रहे हैं या अहित में |

आरे बचाओ के नाम पर असामाजिक तत्वों द्वारा मुंबई का विकास रोकने की साज़िश

aarey

आप में से कई लोगों ने पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया तथा समाचारपत्रों द्वारा आरे बचाओ मुहिम के बारे में सुना होगा | जंगल को बचाने के नाम पर खूब बयानबाज़ी और प्रदर्शन हो रहा है | ऊपरी तौर पर देखने पर यह लगता है कि यह लोग मुंबई के शुभचिंतक है | शहर का जंगल बचाने के लिए मेहनत कर रहे हैं | लेकिन यदि मामले का गहराई से अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि पूरा आंदोलन एक छलावा मात्र है | इसमें शामिल तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता मुंबई का भला करने के बजाय उसका नुकसान ज्यादा कर रहे हैं | 

हम सब जानते हैं कि मुंबई की इस विशाल आबादी की वजह से हमारे यातायात के साधनों पर प्रचंड दबाव है | हर वर्ष औसतन दो हजार लोग सिर्फ और सिर्फ लोकल ट्रेन की दुर्घटनाओं में मर रहे हैं | इसके अलावा तीन हजार से चार हजार लोगों की मृत्यु सड़क दुर्घटनाओं में हो रही है | इन आंकड़ों से आप लोग साफ़ समझ सकते हैं कि हम लोगों को यातायात के नए साधनों की कितनी ज्यादा जरुरत है | हमकों जल्दी से जल्दी शहर में यातायात के नए साधनों का निर्माण करना ही करना है | 

ऐसे में मेट्रो रेल का प्लान बना | बाकी सरकारी कामों की तरह इसकी रफ़्तार भी काफी धीमी रही | जैसे-तैसे अँधेरी से घाटकोपर के बीच एक लाइन का काम पूरा हुआ | अभी चार और लाइन का काम चल रहा है | लेकिन जबसे यह मेट्रो का काम शुरू हुआ है, तब से इसपर कुछ तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ग्रहण लगाना शुरू कर दिया | कुछ कार्यकर्ताओं ने कोर्ट में केस कर दिया कि मेट्रो को काम दिन में नहीं होना चाहिए, इससे यातायात बाधित होता है | कुछ ने केस कर दिया कि मेट्रो का काम रात में नहीं होना चाहिए क्योंकि शांति भंग होती है | सोचिये इन कार्यकर्ताओं के मूर्खता की हद कितनी है ! मेट्रो का काम दिन में नहीं, रात में नहीं, तो होगा कब ? इस चक्कर में एक वर्ष काम अटका रहा | 

वहाँ से मामला निकला तो इन तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक और शिगूफा छेड़ दिया कि आरे में मेट्रो कारशेड न बनाया जाए | मेट्रो कारशेड तथा अन्य कारणों से वहाँ २७०० पेड़ काटने पड़ रहे हैं | उसी मुद्दे को भावनात्मक तूल देकर वो मेट्रो कारशेड का काम रुकवाने पर तुले हुए हैं | कारशेड आरे में नहीं तो कहाँ बनाया जाए, इसका उन मूर्खों के पास कोई जवाब नहीं है | वो सिर्फ और सिर्फ आरे में हो रहे मेट्रो कारशेड को रुकवाना चाहते हैं | उनसे ज्यादा जोर देकर पूछो कि आरे में नहीं तो कहाँ कारशेड बनाया जाए ? तो उनमें से कुछ दबी जबान में कहते हैं कि कांजुर मार्ग खाली जमीन पर कारशेड बनना चाहिए | पाठकों की जानकारी के लिए बता दूँ कि यह तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता कांजुर मार्ग की जिस जमीन पर कारशेड बनाने के लिए कह रहे हैं वो व्यक्तिगत संपत्ति है | उसपर कोर्ट में केस चल रहा है | कोर्ट ने उसपर किसी भी तरह के निर्माण कार्य पर रोक लगाया हुआ है | यदि सरकार कारशेड के लिए वो जमीन लेने भी जाए तो भी दो से तीन साल लग जाएँगे | ऊपर से पांच हजार करोड़ से ज्यादा का मुआवजा देना पद जाएगा | इसके अलावा आरे में कारशेड बनाने के लिए जो ग्यारह हजार करोड़ खर्च हुआ है, वो भी बर्बाद समझिये | 

आरे बचाओ के नाम पर यह मुर्ख कार्यकर्ता चाहते हैं कि सोलह हजार करोड़ फूँक दिए जाएँ | २७०० पेड़ की बजाय दूसरी जगह पाँच हजार पेड़ लगाकर दस वर्ष उसकी देखभाल करने पर भी सौ करोड़ खर्च नहीं होगा | लेकिन ऐसा करने से इन नकली कार्यकर्ताओं को नाम और शोहरत कहाँ से मिलेगी ? इनके अहंकार की संतुष्टि कैसे होगी ? इसलिए यह लोग अड़े हैं कि किसी भी तरह कारशेड का काम रुकवाया जाए | मेरी सरकार से प्रार्थना है कि ऐसे नकली समाजिक कार्यकर्ताओं के फेर में न पढ़कर जल्दी से जल्दी मेट्रो का काम शुरू करे ताकि हमारे यातायात के साधनों पर बोझ कम हो | आज के लिए इतना ही | फिलहाल इतना ही, लेख बड़ा हो रहा है | अगले लेख में इन नकली समाजिक कार्यकर्ताओं की मूर्खता का और विस्तार से पर्दाफ़ाश करूँगा | 

मंत्रीपद के अहंकार में डूबे मुंबई के भाजपा विधायक आशीष शेलार ने विद्यार्थी की सहायता करने से किया इनकार

ashish-shelar

किसी भी अयोग्य व्यक्ति को जब बिना उसकी मेहनत के कोई बड़ी प्रतिष्ठा का पद मिल जाता है तो उसका घमंड उसके सर चढ़ के बोलने लगता है | ऐसा ही कुछ हो रहा है महाराष्ट्र के शिक्षा मंत्री आशीष शेलार के साथ | आशीष शेलार मुंबई के बांद्रा पश्चिम से भाजपा के विधायक हैं | मंत्री बनने से पहले मुंबई भाजपा के अध्यक्ष थे | संगठन के पद पर रहते हुए बहुत ज्यादा मलाई मिल नहीं सकती थी, इसलिए चुनाव के छः महीने पहले हाथ-पैर मारकर मंत्री पद ले लिया है |

शेलार जी मंत्री तो बन गए हैं लेकिन उनका जनता की सेवा से कोई लेना-देना नहीं है | जब मुंबई भाजपा के अध्यक्ष थे तब गुंडे पालने का शौक रखते थे | निलेश पराड़कर जो कि छोटा राजन का मुंबई में पूरा काम देखता है उसे भाजपा में आमंत्रित कर संगठन का पदाधिकारी बनानेवाले यही महानुभाव थे | जब मीडिया में इस बात को लेकर हंगामा मचा तो मजबूरी में निलेश पराड़कर को हटाना पड़ा | एक नामी गैंगस्टर को संगठन का पदाधिकारी बनाने के लिए जो बेशर्मी चाहिए वो आशीष शेलार में कूट कर भरी है |

पुरानी बातों को जाने दीजिये | मंत्री जी का नया कारनामा सुनिए | सेंट ज़ेवियर कॉलेज, फोर्ट, मुंबई का एक विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए जापान जाना चाहता है | उसका वहाँ एडमिशन भी हो गया | विदेशी संस्थाएँ भारतीय विद्यार्थियों से उनके डिग्री सर्टिफिकेट्स की ट्रांसक्रिप्ट माँगती है | विद्यार्थी ने जिन दो संस्थाओं में पढ़ाई की थी वहाँ ट्रांसक्रिप्ट के लिए आवेदन कर दिया | एक संस्था ने तो तीन दिन में ट्रांसक्रिप्ट दे दिया लेकिन सेंट ज़ेवियर कॉलेज १२-१३ दिन बीतने के बाद भी ट्रांसक्रिप्ट नहीं दे रहा था | उनका कहना था कि ट्रांसक्रिप्ट देने के लिए छः महीने लगते हैं | अब ऐसे में विद्यार्थी का जापान में जो एडमिशन हुआ था वो तो कैंसिल हो जाता | बार-बार प्रार्थना करने के बाद भी सेंट ज़ेवियर कॉलेज के वाईस प्रिसिपल का ह्रदय नहीं पसीजा |

दूसरा कोई समाधान न निकालता देख विद्यार्थी और उसके कुछ शुभचिंतकों ने सोचा कि मंत्री जी से सहायता ली जाए | किसी तरह से आशीष शेलार का फ़ोन नंबर निकाला गया | उन्हें फ़ोन कर मामले की पूरी जानकारी दी गयी | ट्रांसक्रिप्ट जल्दी मिलना क्यों जरुरी है, यह उन्हें बताया गया | सब जानने के बाद मंत्री जी ने सहायता करना तो दूर उल्टा फ़ोन करनेवाले से ही बदतमीजी शुरू कर दी| उनका कहना था कि उनके पास बहुत सारे काम है | कोई भी मुँह उठाकर उन्हें फ़ोन कर दे तो ऐसे वो हर किसी का काम नहीं कर सकते | कॉलेजों की जिम्मेदारी भी उनकी नहीं है | उन्हें ट्रांसक्रिप्ट क्या होता है यह पता नहीं था, न ही बताने पर समझ आया | उन्होंने विद्यार्थी की सहायता करने से साफ़-साफ़ इनकार कर दिया | उनकी बातों में उनके मंत्रीपद का घमंड साफ़ झलक रहा था | सहायता की उम्मीद में बैठी आम जनता उनके लिए चाय में पड़ी मक्खी की तरह है जिसे चुनाव के बाद उठाकर बाहर फेंकना होता है |

बहरहाल विद्यार्थी के शुभचिंतकों ने इस मामले को फेसबुक तथा अन्य सोशल मीडिया में उठाया | जिसके दबाव में आकर सेंट ज़ेवियर कॉलेज ने विद्यार्थी को एक दिन में उसका ट्रांसक्रिप्ट दे दिया | चलिए अंत भला तो सब भला | फिर भी मैनें सोचा चलो आप लोगों को बता दूँ कि मोदी जी का चेहरा देखकर हमने कैसे-कैसे निकम्मों को अपना वोट दे दिया है |

रिश्वतखोर पुलिस इंस्पेक्टर नरेंद्र तलेगांवकर ने गैरकानूनी पार्किंग कराने के लिए विद्यार्थियों के आने-जाने का रास्ता बंद कराया

Inspector Narendra Talegaonkar
इंस्पेक्टर नरेंद्र तलेगांवकर

वो कहावत है न “ जब पैदा हुई पुलिस तो खुश हुआ इब्लीस, अब हम भी साहिबे औलाद हुए | ” अर्थात जब पुलिस पैदा हुई तो शैतान खुश हुआ कि मेरा बेटा पैदा हो चुका है | मुंबई पुलिस के इंस्पेक्टर नरेंद्र तलेगांवकर पर यह कहावत बिलकुल सही बैठती है | तलेगांवकर फिलहाल ट्रैफिक डिपार्टमेंट में काम कर रहे हैं और वो गांधीनगर जंक्शन, लालबहादुर शास्त्री रोड, विक्रोली पश्चिम, मुंबई-८३ में स्थित बीट चौकी के इंचार्ज हैं |

पाठकों को पता ही होगा, सडकों पर जहाँ भी फ्लाईओवर बने होते हैं, उसके ठीक नीचे की जगह खाली पड़ी होती है | ऐसी जगहों पर कभी पार्किंग होने लगती है तो कभी अवैध निर्माण | कई बार आम लोग ही सड़क पार करने के लिए फ्लाईओवर के नीचे की जगह पसंद करते हैं क्योंकि फ्लाईओवर के अंतिम छोरों के नीचे की जगह खाली पड़ी होती है | जिससे वहाँ से सड़क पार करना आसान होता है |

इंस्पेक्टर नरेंद्र तलेगांवकर द्वारा तैयार कराये गए गैरकानूनी बैरिकेड
इंस्पेक्टर नरेंद्र तलेगांवकर द्वारा तैयार कराये गए गैरकानूनी बैरिकेड

गांधीनगर जंक्शन पर बने फ्लाईओवर के अंतिम छोर के एक तरह केंद्रीय विद्यालय है तो दूसरी तरह चंदन नगर | चंदन नगर से कई विद्यार्थी केंद्रीय विद्यालय जाते हैं और फ्लाईओवर के नीचे से ही सड़क पार करते हैं | वो जगह भी अभी तक खाली ही पड़ी थी | लेकिन पुलिस इंस्पेक्टर नरेंद्र तलेगाँवकर की बुरी नजर लंबे समय से उस जगह टिकी हुई थी | फ्लाईओवर के नीचे ज्यादातर जगहों पर उन्होंने गाड़ियों की गैरकानूनी पार्किंग कराकर खूब माल कमाया है | किसी भी दिन, किसी भी वक्त वहाँ जाओ तो सैकड़ों गाड़ियाँ खड़ी मिलेगी, कुछ पार्किंग की, तो कुछ भंगार होती हुई | यह सब ट्राफिक पुलिस की उस बीट चौकी के ठीक सामने है जिसके इंचार्ज इंस्पेक्टर तलेगाँवकर हैं | सिर्फ एक कोना बाकी रह गया था जहाँ से विद्यार्थी सड़क पार करते थे | तलेगाँवकर ने विद्यार्थियों का आना जाना रोकने के लिए वहाँ गैरकानूनी रूप से लोहे की शीट लगाकर बैरिकेड बनवा दिए | गैरकानूनी पार्किंग को तो वो हटवा नहीं सकते क्योंकि वहाँ से रिश्वत मिलती है, तो उन्होंने विद्यार्थियों पर ही अपना जोर दिखाया |

गैरकानूनी पार्किंग
गैरकानूनी पार्किंग

तलेगांवकर की इस हरकत से विद्यार्थी और उनके माँ-बाप परेशान | उन्हें अब गांधीनगर जंक्शन से सड़क पार करना पड़ रहा है जो काफी खतरनाक है | वहाँ गाड़ियों की आवाजाही कुछ ज्यादा ही है | इसलिए सब अभिभावक इकट्ठा होकर बीट चौकी गए और तलेगांवकर से माँग की कि बैरिकेड को हटा दिया जाये | तलेगांवकर ने उनकी बात मानना तो दूर, उलटे कुछ को अपनी बीट चौकी में बंद करा दिया | साथ में पुलिस में FIR कराने की धमकी भी दी | कई घंटे बंद रखने के बाद जब स्थानीय राजनेताओं का फ़ोन आने लगा तो उन्होंने अभिभावकों को जाने दिया |

इंस्पेक्टर नरेंद्र तलेगाँवकर की इस गुंडागर्दी से परेशान होकर कई अभिभावकों ने भाजपा कार्यकर्ता सुधीर सिंह से सहायता माँगी | सुधीर सिंह ने मामले की जानकारी स्थानीय सांसद मनोज कोटक को दी | साथ ही साथ उन्होंने तलेगाँवकर के भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी की शिकायत मुंबई पुलिस कमिश्नर से की | इसके अलावा तलेगाँवकर द्वारा किये गए अवैध निर्माण को तोड़ने के लिए मनपा के S वार्ड में भी शिकायत दर्ज करा दी है | उम्मीद है उन्हें दोनों कार्यों में सफलता मिलेगी और चंदन नगर के विद्यार्थियों की असुविधा दूर होगी | लगता है इंस्पेक्टर नरेंद्र तलेगांवकर को उनके कुकर्मों की सजा मिलने का दिन आ गया है |